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Monday, 1 May 2017

हम कुछ ऐसे कदम ज़रूर उठा सकते हैं, जिन्हें अपनाने से बीमारी होने का खतरा कम हो सकता है और कई मामलों में तो शायद हमें बीमारी हो ही नहीं






ग्राम खोरपा ,अभनपुर ब्लॉक से करीब पैंतीस बच्चों की टीम बालाजी हॉस्पिटल टिकरापारा में भ्रमण के लिए आई हुई थी। उनके कोऑर्डिनेटर श्री सालिक राम जी ने डॉ सत्यजीत साहू से उनको अच्छी सेहत के बारे में बताने को कहा। उसी का अंश यहाँ पर प्रस्तुत है। 

हममें से कोई भी बीमार नहीं पड़ना चाहता है। जब हम बीमार पड़ते हैं, तो हमें बहुत परेशानी होती है, ऊपर से इसका खर्चा भी उठाना पड़ता है। हमें कुछ अच्छा नहीं लगता। न हम स्कूल जा पाते हैं, न ही काम की जगह पर। पैसा कमाना तो दूर, हम घरवालों की मदद तक नहीं कर सकते। उलटा शायद उन्हें हमारी देखभाल करनी पड़े। और-तो-और, कई बार इलाज करवाने और दवाइयाँ खरीदने के लिए बहुत पैसा लग जाता है।


कहा जाता है कि इलाज करवाने से बेहतर है कि हम एहतियात बरतें, ताकि हम बीमार ही न हों। माना कि कई बीमारियों से हम बच नहीं सकते। लेकिन


हम कुछ ऐसे कदम ज़रूर उठा सकते हैं, जिन्हें अपनाने से बीमारी होने का खतरा कम हो सकता है और कई मामलों में तो शायद हमें बीमारी हो ही नहीं। आइए ऐसी पाँच बातों पर गौर करें, जिन्हें ध्यान में रखने से आप अच्छी सेहत पा सकते हैं।


 1 साफ-सफाई का खयाल रखिए

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का मानना है कि “बीमारी से बचने और उसे फैलने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका है” अपने हाथ धोना। गंदे हाथों पर कीटाणु होते हैं और जब हम गंदे हाथों से नाक पोंछते हैं या आँखें मलते हैं, तो सर्दी-ज़ुकाम और फ्लू जैसी बीमारियाँ आसानी से फैल जाती हैं। ऐसी बीमारियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है समय-समय पर अपने हाथ धोते रहना। अगर हम साफ-सफाई का अच्छा ध्यान रखें, तो हम निमोनिया और दस्त जैसी गंभीर बीमारियों से बच सकते हैं, जिनसे हर साल 5 वर्ष से कम उम्र के करीब 20 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। यहाँ तक कि सिर्फ अपने हाथ धोने से कई  जानलेवा बीमारी को फैलने से भी काफी हद तक रोका जा सकता है।


अपनी और दूसरों की सेहत को ध्यान में रखते हुए, कई मौकों पर हाथ धोना बहुत ज़रूरी होता है, जैसे:


शौचालय जाने के बाद।

डायपर बदलने के बाद या बच्चे को शौचालय ले जाने के बाद।

घाव या चोट पर दवा लगाने से पहले और उसके बाद।

किसी बीमार व्यक्‍ति से मिलने से पहले और उसके बाद।

खाना बनाने, परोसने और खाने से पहले।

छींकने, खाँसने और नाक साफ करने के बाद।

पशुओं और उनके मल को छूने के बाद।

कूड़ा-कचरा फेंकने के बाद।

क्या आपको लगता है कि आप अपने हाथ अच्छी तरह धोते हैं? ज़रा इस बात पर गौर कीजिए। आँकड़े बताते हैं कि सरकारी शौचालय इस्तेमाल करने के बाद बहुत-से लोग अपने हाथ साफ नहीं करते और अगर करते भी हैं, तो उन्हें अच्छी तरह नहीं धोते। तो सवाल उठता है कि आपको अपने हाथ कैसे धोने चाहिए?


हाथों पर पानी ढालिए और फिर साबुन लगाइए।

अपने दोनों हाथों को मलिए जब तक कि उनमें झाग न बन जाए, और अपने नाखूनों, अँगूठों, हाथों के पीछे और उँगलियों के बीच साफ करना मत भूलिए।

करीब 20 सेकंड तक ऐसा करते रहिए।

फिर साफ बहते पानी से हाथ धो लीजिए।

साफ तौलिए या टिशू-पेपर से हाथ पोंछिए।

शायद हमें ये बातें मामूली लगें, लेकिन इन्हें मानने से बीमारियाँ कम फैलेंगी और कई जानें बच सकती हैं।


 2 साफ पानी इस्तेमाल कीजिए

कई स्थानों में साफ पानी आसानी से नहीं मिलता इसलिए लोगों को हर रोज़ अपने परिवार के लिए साफ पानी का इंतज़ाम करना पड़ता है। लेकिन जहाँ  यह समस्या नहीं है, वहाँ भी बाढ़, आंधी-तूफान, पानी की पाइप टूटने या किसी दूसरी वजह से साफ पानी मिलना मुश्किल हो सकता है। अगर पानी साफ जगह से नहीं आ रहा है या अच्छे से नहीं रखा गया है, तो इससे हमारे पेट में कीड़े पड़ सकते हैं और हमें हैज़ा, जानलेवा दस्त, टाइफाइड, हेपेटाइटिस और दूसरी बीमारियाँ हो सकती हैं। पीने का पानी साफ न होने की वजह से हर साल करीब 170 करोड़ लोग दस्त के शिकार हो जाते हैं।


हम कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं, जिससे हमारी सेहत सुधर सकती है और कई मामलों में तो शायद काफी समय तक हमें बीमारियाँ हों ही नहीं

हैज़ा आम तौर पर ऐसे पानी या खाने से फैलता है, जो हैज़े से पीड़ित व्यक्‍ति के मल से दूषित हो। पानी से आम तौर पर फैलनेवाली या किसी बाढ़-भूकंप के बाद फैलनेवाली बीमारियों से बचने के लिए आप यहाँ बताए कुछ कदम उठा सकते हैं।


इस बात का ध्यान रखिए कि पीने का पानी और जिस पानी से आप अपने दाँत साफ करते हैं, बर्फ जमाते हैं, फल-सब्ज़ियाँ और बरतन साफ करते हैं और खाना बनाते हैं, वह साफ हो, फिर चाहे वह नगरपालिका की तरफ से साफ किया गया हो या फिर किसी अच्छी कंपनी का बोतल-बंद पानी हो।

अगर आपको लगता है कि नगरपालिका की तरफ से आनेवाला पानी दूषित हो गया है, तो उस पानी को इस्तेमाल करने से पहले उसे उबाल लीजिए और उसमें दवाई डालकर उसे साफ कर लीजिए।

जब आप पानी साफ करने के लिए क्लोरीन या कोई दूसरी दवाई इस्तेमाल करते हैं, तो उसे सही मात्रा में डालिए।

हो सके तो बढ़िया किस्म के पानी का फिल्टर खरीदिए।

पानी को हमेशा साफ बरतन में ढककर रखिए जिससे कि वह गंदा न हो।

घड़े या किसी बरतन से पानी निकालने के लिए हमेशा साफ बरतन का इस्तेमाल कीजिए।

बरतन में पानी भरने या उससे पानी लेने से पहले हाथ धोइए और पीने के पानी में हाथ या उँगलियाँ मत डालिए।

 3 अपने खान-पान पर ध्यान दीजिए

अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी है कि आप पौष्टिक खाना खाएँ। इस बात का ध्यान रखिए कि आपके खाने में नमक, चिकनाई और मीठा सही मात्रा में हो और आप ज़रूरत से ज़्यादा खाना न खाएँ। तरह-तरह की फल और सब्ज़ियाँ खाएँ। ब्रेड, अनाज, नूडल्स और चावल जैसी चीज़ें खरीदते वक्‍त, उनके पैकेट पर दी गयी जानकारी पर ध्यान दें। छिलकेदार अनाज सेहत के लिए मैदे से बनी चीज़ों से बेहतर होता है। जहाँ तक खाने में प्रोटीन का सवाल है, अगर आप मांस-मच्छी खाते हैं, तो बगैर चरबीवाला थोड़ा-सा ही मांस खाइए और हो सके तो हफ्ते में दो-तीन बार मछली खाइए। कई देशों में शाकाहारी लोगों के लिए भी काफी मात्रा में ऐसी चीज़ें मिलती हैं जिनमें प्रोटीन होता है।


ज़्यादा मीठा और चिकना खाना खाने से मोटे होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए शरबत और कोल्ड-ड्रिंक पीने के बजाय पानी पीएँ। कुछ मीठा खाने के बजाय ज़्यादा फल खाएँ। मांस, मक्खन, केक, चीज़ और बिस्कुट जैसी चीज़ें ज़्यादा मात्रा में न खाएँ, जिनमें चिकनाहट होती है। खाना बनाने के लिए मक्खन, वनस्पति घी जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करने के बजाय, ऐसे तेल का इस्तेमाल कीजिए जो सेहत के लिए फायदेमंद हो।


खाने में ज़्यादा नमक लेने से ब्लड प्रेशर (रक्‍तचाप) बढ़ सकता है, जो सेहत के लिए नुकसानदेह है। अगर आपका ब्लड प्रेशर ज़्यादा है, तो खाने की चीज़ें खरीदते वक्‍त पैकेट पर दी जानकारी देखिए कि उनमें कितना नमक है।


आप जो खाते हैं उसका तो आपकी सेहत पर असर पड़ता ही है, लेकिन आप कितना खाते हैं वह भी बहुत मायने रखता है। खाने का पूरा-पूरा मज़ा लीजिए, लेकिन उतना ही खाइए जितनी आपको भूख है।


अगर खाना सही तरह से तैयार न किया गया हो या ठीक से रखा न गया हो, तो तबियत खराब हो सकती है। एक पत्रिका में बताया गया था कि खाना खराब होने की वजह से आए दिन लोग बीमार पड़ जाते हैं और कई लोगों की मौत भी हो जाती है। ऐसी बीमारी से बचने के लिए आप नीचे दिए कदम उठा सकते हैं।


जहाँ सब्ज़ियाँ उगायी गयी हैं, हो सकता है वहाँ खाद डाली गयी हो, इसलिए उन्हें पकाने से पहले अच्छी तरह धोइए।

खाना पकाने से पहले अपने हाथों को, जिस पर आप सब्ज़ी काटते हैं, पकाने की जगह और बरतनों को गर्म पानी और साबुन से अच्छी तरह धोइए।

अगर किसी बरतन में कच्चा अंडा या कच्चा मांस या मछली रखी हुई थी, तो उस बरतन को धोने के बाद ही उसमें खाना रखिए।

खाने को अच्छी तरह पकाइए। अगर आप जल्दी खराब होनेवाली चीज़ों को उसी वक्‍त नहीं खानेवाले हैं, तो उन्हें फौरन फ्रिज में रख दीजिए।

अगर जल्दी खराब होनेवाली चीज़ें दो घंटे से बाहर रखी हों, तो उन्हें फेंक दीजिए। अगर तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा है और खाना एक घंटे से बाहर रखा है, तो उसे फेंक दीजिए।

 4 कसरत कीजिए

चाहे आपकी उम्र जो भी हो, चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए आपको रोज़ कसरत करनी चाहिए। आजकल कई लोग उतनी कसरत नहीं करते, जितनी उन्हें करनी चाहिए। कसरत करना क्यों ज़रूरी है? कसरत करने से आपको ये फायदे होंगे:


आपको अच्छी नींद आएगी।

आपको चलने-फिरने में कोई परेशानी नहीं होगी।

आपकी मांस-पेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत रहेंगी।

आप मोटापे के शिकार नहीं होंगे।

मुमकिन है कि आप निराशा के शिकार नहीं होंगे।

मुमकिन है कि आपकी उम्र लंबी होगी।

कसरत न करने से आपको ये बीमारियाँ हो सकती हैं:


दिल की बीमारी हो सकती है।

शुगर की बीमारी (टाइप 2 डायबिटीज़) हो सकती है।

ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है।

कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है।

स्ट्रोक हो सकता है।

आपकी उम्र और सेहत पर निर्भर करता है कि आपको किस तरह की कसरत करनी चाहिए। इसलिए कसरत शुरू करने से पहले आपको अपने डाक्टर से सलाह-मशविरा करना चाहिए कि इस तरह की कसरत आपके लिए सही रहेगी या नहीं। कई जानकारों का कहना है कि बच्चों और नौजवानों को हर रोज़ कम-से-कम 60 मिनट तक कसरत करनी चाहिए और बड़ों को हर हफ्ते कम-से-कम 150 मिनट तक हलकी-फुलकी कसरत या 75 मिनट तक अच्छी तरह कसरत करनी चाहिए।


कसरत करने के लिए आप कुछ ऐसा कर सकते हैं, जिसमें आपको मज़ा आए, जैसे बास्केटबॉल, टेनिस या फुटबाल खेलना, साइकिल चलाना, बागबानी करना, लकड़ी काटना, तैरना, नाव चलाना, दौड़ लगाना या इस तरह की कोई दूसरी कसरत। आप यह कैसे पता लगा सकते हैं कि आप हलकी-फुलकी कसरत कर रहे हैं या अच्छी कसरत कर रहे हैं? अगर आप हलकी-फुलकी कसरत कर रहे हैं, तो आपको पसीना आने लगेगा, लेकिन अगर आप अच्छी तरह कसरत कर रहे हैं, तो कसरत करने के साथ-साथ आपके लिए किसी से बातचीत करना बहुत मुश्किल होगा।


 5 भरपूर नींद लीजिए

सभी लोग अपनी-अपनी ज़रूरत के हिसाब से सोते हैं। नए जन्मे बच्चे हर दिन अकसर 16 से 18 घंटे सोते हैं, 1 से 3 साल के बच्चे 14 घंटे सोते हैं और 3 से 4 साल के बच्चे 11 से 12 घंटे सोते हैं। स्कूल जानेवाले बच्चों को कम-से-कम 10 घंटे सोना चाहिए, किशोर बच्चों को 9 से 10 घंटे सोना चाहिए और बड़ों को 7 से 8 घंटे तक सोना चाहिए।


आराम करने की बात को हलके में मत लीजिए। जानकारों का कहना है कि अच्छी नींद लेना ज़रूरी है क्योंकि इससे:


बच्चों और नौजवानों का मानसिक और शारीरिक विकास होता है।

हम नयी-नयी बातें सीख पाते हैं और उन्हें याद रख पाते हैं।

शरीर में हार्मोन का सही संतुलन बना रहता है, जिसका हाज़मे और वज़न पर असर पड़ता है।

दिल की बीमारी होने का खतरा कम हो सकता है।

हम कई बीमारियों से बचे रह सकते हैं।

ऐसा पाया गया है कि नींद की कमी की वजह से मोटापा, निराशा, डायबिटीज़, दिल की बीमारी और दुर्घटनाएँ हुई हैं। इससे साफ हो जाता है कि अच्छी नींद लेना इतना ज़रूरी क्यों है।


अगर आपको नींद नहीं आती या आपकी नींद पूरी नहीं होती, तब आप क्या कर सकते हैं? नीचे दिए कुछ तरीके आज़माइए।


हर रोज़ तय समय पर सोने और उठने की कोशिश कीजिए।

कोशिश कीजिए कि जहाँ आप सोते हैं, वहाँ शांति और अँधेरा हो और कमरा न ज़्यादा ठंडा हो और न ज़्यादा गर्म।

जब आप सोने जाते हैं, तो टी.वी मत देखिए और न ही मोबाइल वगैरह का इस्तेमाल कीजिए।

बिस्तर को आरामदायक बनाइए।

सोने से पहले ज़्यादा मत खाइए, चाय-कॉफी या शराब मत पीजिए।

अगर इन सुझावों को लागू करने के बाद भी आपको नींद नहीं आती या फिर दिन में नींद आती हैं या सोते वक्‍त साँस लेने में तकलीफ होती है, तो डॉक्टर को दिखाइए।

(बालाजी हॉस्पिटल टिकरापारा  में इलाज के लिये संपर्क करें - 77475156 ,769401615 ,89995519 )

Saturday, 29 April 2017

सोरायसिस सोरायसिस एक आॅटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है

कई ऐसे त्वचा रोग हैं, जो लंबे समय तक रोगी को परेशान करते हैं. कई बार लंबे समय तक इलाज के बावजूद ये ठीक नहीं होते हैं. ऐसे में रोगी निराश भी हो जाते हैं. सोरायसिस एक ऐसा ही रोग है, जो आॅटो इम्यून डिसआॅर्डर है. अगर सही तरीके से धैर्य रख कर इलाज कराया जाये, तो इस रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है
इस रोग के बारे में जानकारी दे रहे हैं डॉ सत्यजीत साहू 


 सोरायसिस क्रॉनिक यानी बार बार होनेवाला आॅटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के अनेक अंगो को प्रभावित करता है. यह मुख्य रूप से त्वचा पर दिखाई देता है, इसलिए इसे चर्म रोग ही समझा जाता है. यह किसी भी उम्र में हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में लगभग एक प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है पर अकसर 20-30 वर्ष की आयु में अधिक आरंभ होता है. 60 वर्ष की आयु के बाद इसके होने की आशंका अत्यंत कम होती है. 5-10 प्रतिशत रोगियों में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य को भी इस रोग से पीड़ित देखा गया है

त्वचा की सबसे बाहरी परत (एपिडर्मिस) की अरबों कोशिकाएं प्रतिदिन झड़ कर नयी कोशिकाएं बनती हैं और एक महीने में पूरी नयी त्वचा का निर्माण हो जाता है. सोरायसिस में कोशिकाओं का निर्माण असामान्य रूप से तेज हो जाता है और नयी कोशिकाएं एक माह की जगह चार-पांच दिनों में बन कर मोटी चमकीली परत के रूप में दिखाई पड़ती हैं और आसानी से झड़ने लगती है. चोट लगने, संक्रामक रोग के बाद या अन्य दवाओं के कुप्रभाव के कारण भी सोरायसिस की शुरुआत होती है. इस रोग के लक्षण  सोरायसिस कोहनी, घुटनों, खोपड़ी, पीठ, पेट, हाथ, पांव की त्वचा पर अधिक होता है. शुरुआत में त्वचा पर रूखापन जाता है, लालिमा लिये छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. ये दाने मिल कर छोटे या फिर काफी बड़े चकत्तों का रूप ले लेते है. चकत्तों की त्वचा मोटी हो जाती हैहल्की या तेज खुजली होती है. खुजलाने से त्वचा से चमकीली पतली परत निकलती है. परत निकलने के बाद नीचे की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है और खून की छोटी बूंदे दिखाई पड़ सकती हैं. खोपड़ी की त्वचा प्रभावित होने पर यह कभी रूसी की तरह या अत्यधिक मोटी परत के रूप में दिखाई पड़ती है. नाखूनों के प्रभावित होने पर उनमें छोटे-छोटे गड्ढे हो सकते हैं. विकृत हो कर मोटे या टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं. नाखून पूरी तरह नष्ट भी हो सकते हैं.  
लगभग 20% सोरायसिस के पुराने रोगियों के जोड़ों में दर्द और सूजन भी हो जाती है, जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है. अधिकांश रोगियों में रोग के लक्षण ठंड के समय में बढ़ जाते हैं. पर कुछ रोगियों को गरमी के महीने में अधिक परेशानी होती है. तनाव, शराब के सेवन या धूम्रपान से भी लक्षण बढ़ जाते हैं. अधिक प्रोटीन युक्त भोजन जैसे-मांस, सोयाबीन, दालों के सेवन से भी रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है



यह छूत की बीमारी नहीं है. जिद्दी त्वचा रोग है 

सोरायसिस सोरायसिस एक आॅटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है. यह रोग काफी जिद्दी है और लंबे समय तक परेशान करता है. अगर धैर्य रख कर इसका उपचार सही तरीके से कराया जाये, तो इससे छुटकारा मिल सकता है. आयुर्वेद से इसके ठीक होने की संभावना अधिक होती है




रोग के अनेक प्रकार
 प्लाक सोरायसिस : लगभग 70-80 % रोगी प्लाक सोरायसिस से ही ग्रस्त होते हैं. इसमें कोहनियों, घुटनों, पीठ, कमर, पेट और खोपड़ी की त्वचा पर रक्तिम, छिलकेदार मोटे धब्बे या चकत्ते निकल आते हैं. इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है. गट्टेट सोरायसिस : यह अकसर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर छोटे -छोटे लाल दानों के रूप में दिखाई पड़ता है. प्रभावित त्वचा प्लाक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है. अनेक रोगी स्वत: या इलाज से चार-छह हफ्तों में ठीक हो जाते हैं. पर कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में परिवर्तित हो सकते हैं पामोप्लांटर सोरायसिस : यह मुख्य रूप से हथेलियों और तलवों को प्रभावित करता हैपुस्चुलर सोरायसिस: इस प्रकार में अकसर हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लालिमा से घिरे दानों में मवाद हो जाता हैएरिथ्रोडार्मिक सोरायसिस : इस प्रकार के सोरायसिस में चेहरे समेत शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लालिमा लिये चकत्ते हो जाते हैं. शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है और समय पर उचित चिकित्सा नहीं होने पर रोगी के प्राण जा सकते हैंइन्वर्स सोरायसिस : इसमे स्तनों के नीचे, बगल, कांख या जांघों के उपरी हिस्से में लाल बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं





सोरायसिस की चिकित्सा  



यह एक हठीला रोग है, जो अकसर पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. यदि एक बार हो गया, तो जीवन भर चल सकता है. अर्थात् रोग होता है, फिर ठीक भी होता है, लेकिन बाद में फिर हो जाता है. कुछ रोगियों में यह लगातार भी रह सकता है. हालांकि इसके कुछ रोगी अपने आप ठीक भी हो जाते हैंक्यों ठीक होते हैं अभी तक कारण अज्ञात है. कुछ नये रोगी धैर्य से खान-पान परहेज के साथ जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन और सावधानियों के साथ दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं अथवा रोग के लक्षणों से लंबी अवधि के लिए मुक्ति मिल जाती है. रोग के प्रारंभ में ही यदि आयुर्वेद विज्ञान से उपचार कराया जाता है, तो उपचार से रोग के ठीक होने की अधिक संभावना है. पुराने रोगियों को भी तुलनात्मक दृष्टि से कम खर्च में काफी राहत मिल जाती है. और रोगी बगैर परेशानी के सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है


एलोपैथ चिकित्सा प्रणाली में कुछ वर्षों पहले तक इसकी संतोषजनक चिकित्सा नहीं थी. विगत एक दशक में कई प्रभावकारी दवाएं विकसित हुई हैं, जिनके प्रयोग से लंबे समय तक रोग के लक्षणों से राहत मिल जाती है.  




एलोपैथ चिकित्सा  

साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैंपुवा (पीयूवीए) थेरेपी : अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक  रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता. बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है. इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैंसेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही लेनी चाहिए. रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है.                             


 रोग होने पर क्या करें   
विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लें. एलोपैथ के साथ-साथ इस रोग में लाभकारी खानपान, जीवनशैली, आयुर्वेद तथा वनौषधियों के प्रयोग से इसमें लाभ मिलता है. नीम-हकीमों के और गारंटी से ठीक कर देनेवालों के चक्कर में अकसर धन और समय की हानि के साथ-साथ रोग की जटिलताएं बढ़ जाती हैं. क्या है आॅटोइम्यून डिजीज   आहार, विहार तथा जीवनशैली में गड़बड़ी के साथ-साथ निरंतर बढ़ते कृत्रिम रसायनों के उपयोग, प्रदूषण जैसे ज्ञात तथा अनेक अज्ञात कारणों से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति (इम्युनिटी) अपने ही शरीर के अंगो को हानि पंहुचाने लगती है और विभिन्न रोगों का कारण बनती है. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि यदि पुलिस या सेना में विद्रोह हो जाये, तो वे नागरिक, समाज और देश की सुरक्षा के बजाय अपने ही नागरिकों और व्यवस्था के प्रति हिंसक हो जाते हैं. ठीक ऐसी ही घटना शरीर में भी होती है. इसी के कारण कोशिकाओं में तीव्र गति से वृद्धि होने लगती है. कुछ आॅटोइम्यून बीमारियां : रुमेटॉयड आर्थराइटिस, सोरायसिस, हासिमोटो, थायरॉयड, ल्यूपस एरिदोमेटेसिस, स्क्लेरोडर्मा, अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रोह्नस डिजीज, विटिलिगो, एलोपेसिया एयार्टा आदि अनेक रोग इस श्रेणी में आते हैं

आयुर्वेद में सोरायसिस को एक कुष्ठ, मंडल कुष्ठ या किटिभ कुष्ठ जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बोलचाल की भाषा में कुछ लोग इसे छाल रोग भी कहते हैं. क्या हैं कारण  शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की गड़बड़ी को इसका कारण माना जाता है
आयुर्वेद में विरुद्ध आहार या असंतुलित खान-पान के कारण पित्त और कफ दोषों में होनेवाली विकृति को इसका कारण बताया गया है





 आयुर्वेद ( डॉ संगीता कौशिक एम डी आयुर्वेद )



 आयुर्वेद स्वास्थ्य विज्ञान में सोरायसिस की चिकित्सा के लिए अनेक औषधियों के विकल्प के साथ-साथ आहार-विहार, परहेज का विशेष ध्यान रखा जाता है. कभी-कभी शरीर में व्याप्त हानिकारक तत्वों को निकालने के लिए पंचकर्म नामक विशिष्ट चिकित्सा का प्रयोग काफी लाभ दायक होता है. उपयोगी जड़ी-बूटियां तथा आयुर्वेदिक दवाएं जैसे-घृतकुमारी, श्वेत कुटज, अमृता (गुडिच), नीम, करंज, मजीठ, सारिवा, खदिर, मंडुकपर्णी, कुटकी, नीम, हल्दी, कैशोर गुगलू, रस माणिक्य, महामंजिष्ठादी, पंचतिक्त घृत   प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसीके सेवन के साथ इसके स्थानीय लेप से कई रोगियों को 70-80 प्रतिशत लाभ होने के अनुभव आये हैं. विज्ञान सम्मत तथा परीक्षित उपयोगी घरेलू चिकित्सा -नीम की पत्तियां या गुडिच के तने को पीस कर या उबाल कर सोरायसिस से प्रभावित अंग धोएं. -घृतकुमारी (एलोवेरा) का ताजा गूदा त्वचा पर लगाएं या इस गूदे का प्रतिदिन दो-तीन चम्मच दिन में दो बार सेवन करें. -प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसी) का सेवन करने से भी लाभ होता है. -मांस, मुर्गा, अंडा, उड़द, मटर, सोयाबीन जैसे अधिक प्रोटीन युक्त भोजन करें.  -कपालभाति और अनुलोम-विलोम का नियमित अभ्यास भी रोग से राहत देने में उपयोगी है



होमियोपैथी में उपचार (होमियोपैथी के  जानकार डॉ संजय चटर्जी


 सोरायसिस इम्युनिटी में गड़बड़ी के कारण होता है, इसलिए इसका उपचार करने का सबसे अच्छा तरीका इम्युनिटी में सुधार करना ही है. अत: इम्युनिटी को सुधारने के लिए सोरिनम सीएम शक्ति की दवा चार बूंद महीने में एक बार लेंकाली आर्च : अगर त्वचा से रूसी निकले, नोचने पर और अधिक निकले, रोग जोड़ों पर अधिक हो, तो काली आर्च 200 शक्ति की दवा चार बूंद रोज सुबह में दें. पामर या प्लांटर सोरायसिस : अगर सोरायसिस हथेली या तलवों तक ही सीमित हो, तो इसके लिए सबसे अच्छी दवा फॉस्फोरस है. इसकी 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें. काली सल्फ : सोरायसिस सिर में भी होता है. सिर की त्वचा से सफेद रंग की रूसी निकले और गोल-गोल चकत्ते जैसे हों, तो काली सल्फ 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें. रोग को ठीक होने में लंबा समय लग सकता है. अत: धैर्य रख कर उपचार कराना जरूरी है. (होमियोपैथी के  जानकार डॉ संजय चटर्जी


बालाजी हॉस्पिटल टिकरापारा  में इलाज के लिये संपर्क करें - 77475156 ,769401615 ,89995519 

घुटने के दर्द के लिए सावधानी जरुरी है

घुटनों के अंदरूनी या मध्य भाग में दर्द छोटी मोटी चोंटों या आर्थराईटीज के कारण हो सकता है| लेकिन घुटनों के पीछे का दर्द उस जगह द्रव संचय हो...